<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss'><id>tag:blogger.com,1999:blog-33911561</id><updated>2009-02-21T01:34:59.242-08:00</updated><title type='text'>सैरेन्ध्री (खंडकाव्य)</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://sairendhri.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/33911561/posts/default'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sairendhri.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>जयप्रकाश मानस</name><email>noreply@blogger.com</email></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>4</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-33911561.post-115748559646417125</id><published>2006-09-05T12:43:00.000-07:00</published><updated>2006-09-05T12:48:02.693-07:00</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;span style="font-size:130%;color:#ff6600;"&gt;&lt;strong&gt;सैरेन्ध्री.......&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt;फिर मुँह की खाकर गिर पड़ा दुगुने विगलित वेष से।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धर्मराज भी कंक बने थे वहाँ विराजे,&lt;br /&gt;लगा वज्र-सा उन्हें मौलि घन से गाजे।&lt;br /&gt;सँभले फिर भी किसी तरह वे ‘हरे, हरे,’ कह !&lt;br /&gt;हुए स्तब्ध- सभी सभासद ‘अरे, अरे,’ कह !&lt;br /&gt;करके न किन्तु दृक्पात तक कीचक उठा, चला गया,&lt;br /&gt;मानो विराट ने चित्त में यही कहा कि ‘भला गया’।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सम्बोधन कर सभा-मध्य तब मत्स्यराज को,&lt;br /&gt;बोली कृष्णा कुपित, सुना कर सब समाज को।&lt;br /&gt;मधुर कण्ठ से क्रोध-पूर्ण कहती कटु वाणी,&lt;br /&gt;अद्भुत छबि को प्राप्त हुई तब वह कल्याणी।&lt;br /&gt;ध्वनि यद्यपि थी आवेग-मय, पर वह कर्कश थी नहीं,&lt;br /&gt;मानो उसने बातें सभी वीणा में होकर कहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“भय पाती है जहाँ राजगृह में ही नारी,&lt;br /&gt;होता अत्याचार यथा उस पर है भारी।&lt;br /&gt;सब प्रकार विपरीत जहाँ की रीति निहारी,&lt;br /&gt;अधिकारी ही जहाँ आप हैं अत्याचारी।&lt;br /&gt;लज्जा रहनी अति कठिन है कुल-वधुओं की भी जहां,&lt;br /&gt;हे मत्स्यराज, किस भाँति तुम हुए प्रजा-रंजक वहाँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छोड़ धर्म की रीति, तोड़ मर्यादा सारी,&lt;br /&gt;भरी सभा में लात मुझे कीचक ने मारी,&lt;br /&gt;उसका यह अन्याय देख कर भी भय-दायी,&lt;br /&gt;न्यायासन पर रहे मन तुम बन कर न्यायी !&lt;br /&gt;हे वयोवृद्ध नरनाथ क्या, यही तुम्हारा धर्म है ?&lt;br /&gt;क्या यही तुम्हारे राज्य की राजनीति का मर्म है ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुमसे यदि सामर्थ्य नहीं है अब शासन का,&lt;br /&gt;तो क्यों करते नहीं त्याग तुम राजासन का ?&lt;br /&gt;करने में यदि दमन दुर्जनों का डरते हो,&lt;br /&gt;तो छूकर क्यों राज-दण्ड दूषित करते हो !&lt;br /&gt;तुमसे निज पद का स्वाँग भी, भली भाँति चलता नहीं।&lt;br /&gt;आधिकाररहित इस छत्र का भार तुम्हें खलता नहीं ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्राणसखी जो पञ्च पाण्डवों की पाञ्चाली,&lt;br /&gt;दासी भी मैं उसी द्रौपदी की हूँ आली।&lt;br /&gt;हाय ! आज दुर्दैव-विवश फिरती हूँ मारी,&lt;br /&gt;वचनबद्ध हो रहे वीरवर वे व्रत-धारी।&lt;br /&gt;करता प्रहार उन पर न यों दुर्विध यदि कर्कश कशा&lt;br /&gt;तो क्यों होती मेरी यहाँ इस प्रकार यह दुर्दशा ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अहो ! दयामय धर्मराज, तुम आज कहाँ हो ?&lt;br /&gt;पाण्डु-वंश के कल्पवृक्ष नरराज, कहाँ हो ?&lt;br /&gt;बिना तुम्हारे आज यहाँ अनुचरी तुम्हारी,&lt;br /&gt;होकर यों असहाय भोगती है दुख भारी।&lt;br /&gt;तुम सर्वगुणों के शरण यदि विद्यमान होते यहाँ,&lt;br /&gt;तो इस दासी पर देव, क्यों पड़ती यह विपदा महा ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम-से प्रभु की कृपा-पात्र होकर भी दासी,&lt;br /&gt;मैं अनाथिनी-सदृश यहाँ जाती हूँ त्रासी !&lt;br /&gt;जब आजातरिपु, बात याद मुझको यह आती,&lt;br /&gt;छाती फटती हाय ! दुःख दूना मैं पाती।&lt;br /&gt;कर दी है जिसने लोप-सी नामग-भुजंगों की कथा,&lt;br /&gt;हा ! रहते उस गाण्डीव के हो मुझको ऐसी व्यथा !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस प्रकार है मुझे यहाँ कीचक ने घेरा,&lt;br /&gt;होता यदि वृत्तान्त विदित तुमको यह मेरा।&lt;br /&gt;तो क्या दुर्जन, दुष्ट, दुराचारी यह कामी,&lt;br /&gt;जीवित रहता कभी तुम्हारे कर से खामी !&lt;br /&gt;तुम इस अधर्म अन्याय को देख नहीं सकते कभी,&lt;br /&gt;हे वीर ! तुम्हारी नीति की उपमा देते हैं सभी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्रूर दैव ने दूर कर दिया तुमसे जिसको,&lt;br /&gt;संकट मुझको छोड़ और पड़ता यह किसको ?&lt;br /&gt;यह सब है दुरदुष्ट-योग, इसका क्या कहना ?&lt;br /&gt;मेरा अपने लिए नहीं कुछ अधिक उलाहना।&lt;br /&gt;पर जो मेरे अपमान से तुम सबका अपमान है।&lt;br /&gt;हे कृतलक्षण, मुझको यही चिन्ता महान है !”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुन कर निर्भय वचन याज्ञसेनी के ऐसे,&lt;br /&gt;वैसी ही रह गई सभा, चित्रित हो जैसे।&lt;br /&gt;कही हुई सावेग गिरा उसकी विशुद्ध वर,&lt;br /&gt;एक साथ ही गूँज गई उस समय वहाँ पर।&lt;br /&gt;तब ज्यों ज्यों करके शीघ्र ही अपने मन को रोक के,&lt;br /&gt;यों धर्मराज कहने लगे उसकी ओर विलोक के, -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“हे सैरन्ध्री, व्यग्र न हो तुम, धीरज धारो,&lt;br /&gt;नरपति के प्रति वचन न यों निष्ठुर उच्चारो&lt;br /&gt;न्यायमिलेगा तुम्हें, शीघ्र महलों में जाओ,&lt;br /&gt;नृप हैं अश्रुवृत्त, न को दोष लगाओ।&lt;br /&gt;शर-शक्ति पाण्डवों की किसे ज्ञात नहीं संसार में ?&lt;br /&gt;पर चलता है किसको कहो, वश विधि के व्यापार में ?”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धर्मराज का मर्म समझ कर नत मुखवाली,&lt;br /&gt;अन्तःपुर को चली गई तत्क्षण पांचाली।&lt;br /&gt;किन्तु न तो वह गई किसी के पास वहाँ पर,&lt;br /&gt;और न उसके पास आ सका कोई डर कर।&lt;br /&gt;वह रही अकेली भीगती दीर्घ-दृगों के मेह में,&lt;br /&gt;जब हुई नैश निस्तब्धता गई भीम के गेह में।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बन्द किए भी नेत्र वृकोदर जाग रहे थे,&lt;br /&gt;पड़े-पड़े निःश्वास बड़े वे त्याग रहे थे।&lt;br /&gt;राह उसी की देख रहे थे धीरज खोकर,&lt;br /&gt;वे भी सारा हाल सुन चुके थे हत होकर।&lt;br /&gt;हो गई अधीरा और भी उन्हें देख कर द्रौपदी,&lt;br /&gt;हिम-राशि पिघल रवि-देज से बढ़ा ले चले ज्यों नदी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“जागो, जागो अहो ! भूल सुध, सोने वाले !&lt;br /&gt;ओ अपना सर्वस्त्र आप ही खोने वाले !”&lt;br /&gt;उठ बैठे झट भीम उन्होंने लोचन खोले,&lt;br /&gt;और – “देवि, मैं जाग रहा हूँ” वे यों बोले।&lt;br /&gt;“जब तक तुम हो सर्वस्व भी अपना अपने संग है,&lt;br /&gt;सो नहीं रहा था मैं प्रिये, निन्द्रा तो चिर भंग है।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“मैं तो ऐसा नहीं समझती” कृष्णा बोली –&lt;br /&gt;“करो सजगता की न नाथ, तुम और ठिठोली !&lt;br /&gt;आज आत्म-सम्मान तुम्हारा जाग रहा क्या ?&lt;br /&gt;अब भी तन्द्रा शौर्य्य-वीर्य वह त्याग रहा क्या !&lt;br /&gt;आघात हुए इतने तदपि नहीं हुआ प्रतिघात कुछ,&lt;br /&gt;आती है मेरी समझ में नहीं तुम्हारी बात कुछ !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भोगा सब निज धर्म-भीरुता पर मर जीकर,&lt;br /&gt;कोसूँ फिर क्यों उसे न मैं पानी पी पी कर !&lt;br /&gt;गिना चहूँ मैं कहो सहा है मैंने जो जो,&lt;br /&gt;सिद्ध करूँ सब सत्य,कहा है मैंने जो जो&lt;br /&gt;सहने को अत्याचार को बाध्य करे, वह धर्म है,&lt;br /&gt;तो इस निर्मम संसार में और कौन दुष्कर्म है ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भोजन में विष दिया जिन्होंने और जलाया,&lt;br /&gt;राज-पाट सब लूट-लाट वन-पथ दिखलाया।&lt;br /&gt;माथा ऊँचा किए रहें वे, छिपे फिरें हम,&lt;br /&gt;राज्य करें वे, दास्य-गर्त में हाय ! गिरें हम।&lt;br /&gt;फिर भी कहते हो तुम की मैं जगता हूँ, सोता नहीं,&lt;br /&gt;अच्छा होता है नाथ, तुम सोते ही कहीं !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहते हो सर्वस्व मुझे तुम मैं जब तक हूँ,&lt;br /&gt;रहने दो यह वचन-वंचना, मैं कब तक हूँ,&lt;br /&gt;नंगी की जा चुकी प्रथम ही राज-भवन में,&lt;br /&gt;हरी जा चुकी हाय ! जयद्रथ से फिर वन में !&lt;br /&gt;अब कामी कीचक की यहाँ गृध्र-दृष्टि मुझ पर पड़ी,&lt;br /&gt;सहती हूँ मृत्यु बिना अहो ये विडम्बनाएं बड़ी !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिसके पति हों पाँच पाँच ऐसे बलशाली,&lt;br /&gt;सुरपुर में भी करे कीर्ति जिनकी उजयाली।&lt;br /&gt;काली हो अरि-कान्ति देख कर जिनकी लाली,&lt;br /&gt;सहूँ लाञ्छना प्रिया उन्हीं की मैं पांचाली !”&lt;br /&gt;कहती कहती यों द्रोपदी रह न सकी मानो खड़ी,&lt;br /&gt;मूर्छित होकर वह भीम के चरण-शरण में गिर पड़ी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“धिक है हमको हाय ! सहो तुम ऐसी ज्वाला,”&lt;br /&gt;कहते कहते उसे भीम ने शीघ्र सँभाला।&lt;br /&gt;दीखी वह यों अतुल अंक-आश्रय पाक पति का –&lt;br /&gt;विटप-काण्ड पर पड़ी ग्रीष्म-दग्धा ज्यों लतिका।&lt;br /&gt;“जागो, जागो प्राणप्रिये, बतलाओ मैं क्या करूँ ?&lt;br /&gt;यदि न करूँ तो संसार के सभी पाप सिर पर धरूँ।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जल-सिंचन कर, और व्यंजन कर, हाथ फेर कर,&lt;br /&gt;किया भीम ने सजग उसे कुछ भी न देर कर।&lt;br /&gt;फिर आश्वासन दिया और विश्वास दिलाया,&lt;br /&gt;वचनामृत से सींच सींच हत हृदय जिलाया।&lt;br /&gt;प्रण किया उन्होंने अन्त में कीचक के संहार का,&lt;br /&gt;फिर दोनों ने निश्चय किया साधन सहज प्रकार का।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर दिन कृष्णा सहज भाव से दीख पड़ी यों,&lt;br /&gt;घटना कोई वहाँ घटी ही न हो बड़ी ज्यों।&lt;br /&gt;कीचक से भी हुई सहज ही देखा देखी,&lt;br /&gt;मानो ऐसी सन्धि ठीक ही उसने लेखी।&lt;br /&gt;“सैरन्ध्री” कीचक ने कहा – “अब तो तेरा भ्रम गया ?&lt;br /&gt;विरुद्ध देखा न सब निष्फल तेरा श्रम गया ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब भी मेरा कहामान हठ छोड़ हठीली,&lt;br /&gt;प्रकृति भली है सरल और तनु-यष्टि गठीली !”&lt;br /&gt;सुन कर उसकी बात द्रौपदी कुछ मुसकाई,&lt;br /&gt;मन में घृणा, परन्तु बदन पर लज्जा लाई।&lt;br /&gt;कीचक ने समझा अरुणिमा आई है अनुराग की,&lt;br /&gt;मुँह पर मल दी प्रकृति ने मानों रोली फाग की !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बोली वह – “हे वीर, मनुज का मन चंचल है,&lt;br /&gt;किन्तु सत्य है स्वल्प, अधिक कौशल या छल है।&lt;br /&gt;प्रत्यय रखती नहीं इसीसे मेरी मति भी,&lt;br /&gt;भूल गए हैं मुझे अचानक मेरे पति भी !&lt;br /&gt;अब तुम्हीं कहो, विश्वास मैं रक्खूं किसकी बात पर ?&lt;br /&gt;अन्धेरे में एकाकिनी रोती हूँ बस रात भर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रहता कोई नहीं बात तक करने वाला,&lt;br /&gt;तिस पर शयन-स्थान मिला है मुझे निराला।&lt;br /&gt;कहाँ उत्तरा की सुदीर्घ तौर्यत्रिक शाला,&lt;br /&gt;उसका वह विश्रांन्ति-वास दक्षिण दिशि वाला।&lt;br /&gt;कोई क्या जाने काटती कैसे उसमें रात मैं ?&lt;br /&gt;पागल सी रहती हूँ पड़ी सहकर शोकाघात मैं।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कीचक बोला – “अहा ! आज मैं आ जाऊँगा,&lt;br /&gt;प्रत्यय देकर तुझे प्रेयसी पा जाऊँगा।”&lt;br /&gt;“अन्धेरे में कष्ट न होगा ?” कहकर कृष्णा,&lt;br /&gt;मन्दहास में छिपा ले गई विषम वितृष्णा !&lt;br /&gt;“रौरव में भी तेरे लिए जा सकता हूँ हर्ष से।”&lt;br /&gt;यह कह कर कीचक भी गया मानो विजयोत्कर्ष से।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यथा समय फिर यथा स्थान वह उन्मद आया,&lt;br /&gt;सौरन्ध्री की जगह भीम को उसने पाया।&lt;br /&gt;पर वह समझा यही कि बस यह वही पड़ी है !&lt;br /&gt;बड़े भाग्य से मिली आज यह नई घड़ी है !&lt;br /&gt;झट लिपट गया वह भीम से चपल चित्त के चाव में,&lt;br /&gt;आ जाय वन्य पशु आप खिंच ज्यों अजगर के दाँव में।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पल में घल पिस उठा भीम के आलिंगन से,&lt;br /&gt;दाँत पीस कर लगे दबाने वे घन घन से !&lt;br /&gt;चिल्लाता क्या शब्द-सन्धि थी किधर गले की ?&lt;br /&gt;आ जा सकी न साँस उधर से इधर गले की !&lt;br /&gt;मुख, नयन, श्रवण, नासादी से शोणितोत्स निर्गत हुआ,&lt;br /&gt;बस हाड़ों की चड़ मड़ हुई यों वह उद्धत हत हुआ !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेता है यम प्राण, बोलता है कब शव से ?&lt;br /&gt;पटक पिण्ड-सा उसे भीम बोले नव रव से –&lt;br /&gt;“याईसेनी, आ, देख यही था वह उत्पाती ?&lt;br /&gt;किन्तु चूर हो गई आह ! मेरी भी छाती !”&lt;br /&gt;हँस बोले फिर वे – “बस प्रिये, छोड़ मान की टेकदे,&lt;br /&gt;आकर अपनी हृदयाग्नि से अब तू मुझको सेक दे !”&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देख भीम का भीम कर्म भीमाकृति भारी,&lt;br /&gt;स्वयं द्रौपदी सहम गई भय-वश बेचारी।&lt;br /&gt;कीचक के लिए भी खेस उसको हो आया,&lt;br /&gt;कहाँ जाय वह सदय हृदय ममता-माया ?&lt;br /&gt;हो चाहे जैसा ही प्रबल यह अति निश्चित नीति है,&lt;br /&gt;मारा जाता है शीघ्र ही करता जो अनरीति है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#ff6600;"&gt;क्रमशः .........&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#3333ff;"&gt;==========oooooo==========&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#993300;"&gt;प्रस्तुतिः जयप्रकाश मानस, &lt;/span&gt;&lt;a href="http://srijansamman.blogspot/"&gt;&lt;span style="color:#993300;"&gt;सृजनसम्मान&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#3333ff;"&gt;=========oooooo===========&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/33911561-115748559646417125?l=sairendhri.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sairendhri.blogspot.com/feeds/115748559646417125/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=33911561&amp;postID=115748559646417125' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/33911561/posts/default/115748559646417125'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/33911561/posts/default/115748559646417125'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sairendhri.blogspot.com/2006/09/blog-post_115748559646417125.html' title=''/><author><name>जयप्रकाश मानस</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='14342237620319221204'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-33911561.post-115748542788976346</id><published>2006-09-05T12:41:00.000-07:00</published><updated>2006-09-05T12:43:47.896-07:00</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;span style="font-size:130%;color:#ff6600;"&gt;&lt;strong&gt;सैरेन्ध्री......&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt;बल्लव सम वीर बलिष्ठ का, पक्षपात किसको न हो,&lt;br /&gt;क्या प्रीति नाम में ही प्रकट काम वासना है अहो !”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रानी ने हँस कहा – “दोष क्या तेरा इसमें ?&lt;br /&gt;रहती नहीं अपूर्व गुणों की श्रद्धा किसमें ?&lt;br /&gt;स्वाभाविक है काम-वासना भी हम सबकी,&lt;br /&gt;और नहीं सो सृष्टि नष्ट हो जाती कब की ?&lt;br /&gt;मेरा आशय था बस यही – तू उस जन के योग्य है,&lt;br /&gt;अच्छी से अच्छी वस्तु इस – भव की जिसको भोग्य है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रहने दे इस समय किन्तु यह चर्चा, जा तू,&lt;br /&gt;कीचक को यह चारु चित्र जाकर दे आ तू।&lt;br /&gt;भाई के ही लिए इसे मैंने बनवाया,&lt;br /&gt;वल्लव का यह युद्ध बहुत था उसको भाया।&lt;br /&gt;मेरा भाई भी है बड़ा, वीर और विश्रुत बली,&lt;br /&gt;ऐसे कामों में सदा, खिलती है उसकी कली।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;त्योरी तत्क्षण बदल गई कृष्णा की सहसा,&lt;br /&gt;रानी कायह कथन हुआ उसको दुस्सह-सा।&lt;br /&gt;पालक का जी पली सारिका यथा जला दे,&lt;br /&gt;हाथ फेरते समय अचानक चोंच जला दे !&lt;br /&gt;वह बोली – “क्या यह भूमिका, इसीलिए थी आपकी ?&lt;br /&gt;यह बात ‘महत्पद’ के लिए है कितने परिताप की ?”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहा सुदेष्णा ने कि – “अरे तू क्या कहती है ?&lt;br /&gt;अपने को भी आप सदा भूली रहती है।&lt;br /&gt;करती हूँ सम्मान सदा स्वजनी-सम तेरा,&lt;br /&gt;तू उलटा अपमान आज करती है मेरा !&lt;br /&gt;क्या मैंने आश्रय था दिया, इसीलिए तुझको, बता –&lt;br /&gt;तू कौन और मैं कौन हूँ, इसका भी कुछ है पता ?”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रानी के आत्माभिमान ने धक्का खाया,&lt;br /&gt;सैरन्ध्री को भी न कार्य्य अपना यह भाया।&lt;br /&gt;“क्षमा कीजिए देवि, आप महिषी मैं दासी,&lt;br /&gt;कीचक के प्रति न था हृदय मेरा विश्वासी।&lt;br /&gt;इसलिए न आपे में रही, सुनकर उसकी बात मैं,&lt;br /&gt;सहती हूँ लज्जा-युक्त हा ! उसके वचनागात मैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;होकर उच्च पदस्थ नीच-पथ-गामी है वह,&lt;br /&gt;पाप-दृष्टि से मुझे देखता, -कामी है वह।&lt;br /&gt;नर होकर भी हाय ! सताता है नारी को,&lt;br /&gt;अनाचार क्या कभी है उचित बलधारी को ?&lt;br /&gt;यों तो पशु महिष वराह भी रखते साहस सत्व हैं,&lt;br /&gt;होते परन्तु कुछ और ही, मनुष्यत्व के तत्व हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे न उसके पास भेजिए, यही विनय है,&lt;br /&gt;क्योंकि धर्म्म के लिए वहाँ जाने में भय है।&lt;br /&gt;रखिए अबला रत्न, आप अबला की लज्जा,&lt;br /&gt;सुन मेरा अभियोग कीजिए शासन-सज्जा।&lt;br /&gt;हा ! मुझे प्रलोभन ही नहीं, कीचक ने भय भी दिया,&lt;br /&gt;मर्यादा तोड़ी धर्म की, और असंयम भी किया।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रानी कहने लगी – “शान्त हो, सुन सैरन्ध्री,&lt;br /&gt;अपनी धुन में भूल न जा, कुछ गुन सैरन्ध्री !&lt;br /&gt;भाई पर तो दोष लगाती है तू ऐसे,&lt;br /&gt;पर मेरा आदेश भंग करती है कैसे ?&lt;br /&gt;क्या जाने से ही तू वहाँ फिर आने पाती नहीं ?&lt;br /&gt;होती हैं बातें प्रेम की, सफल भला बल से कहीं !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तू जिसकी यों बार बार कर रही बुराई,&lt;br /&gt;भूल न जा, वह शक्ति-शील है मेरा भाई !&lt;br /&gt;करता है वह प्यार तुझे तो यह तो तेरा –&lt;br /&gt;गौरव ही है, यही अटल निश्चय है मेरा।&lt;br /&gt;तू है ऐसी गुण-शालिनी, जोदेखे मोहे वही,&lt;br /&gt;फिर इसमें उसका दोष क्या, चिन्तनीय है बस यही।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तू सनाथिनी हो कि न हो उस नर पुंगव से,&lt;br /&gt;उदासीन ही रहे क्यों न वैभव से, भव से।&lt;br /&gt;पर तू चाहे लाख गालियाँ दी जो मुझको,&lt;br /&gt;मैं भाभी ही कहा करूँगी अब से तुझको !&lt;br /&gt;जा, दे आ अब यह चित्र तू जाकर अपनी चाल से।”&lt;br /&gt;हो गई मूढ़-सी द्रौपदी, इस विचित्र वाग्जाल से।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बोली फिर – “आदेश आपका शिरोधार्य है,&lt;br /&gt;होने को अनिवार्य किन्तु कुछ अशुभ कार्य है !&lt;br /&gt;पापी जन का पाप उसी का भक्षक होगा।”&lt;br /&gt;चलते चलते उसने कहा, नभ की ओर निहार के –&lt;br /&gt;“द्रष्टा हो दिनकर देव तुम, मेरे शुद्धाचार के।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ठोका उसने मध्य मार्ग में आकर माथा –&lt;br /&gt;“रानी करने चली आज है मुझे सनाथा !&lt;br /&gt;विश्वनाथ हैं तो अनाथ हम किसको मानें ?&lt;br /&gt;मैं अनाथ हूँ या सनाथ, कोई क्या जानें ?&lt;br /&gt;मुझको सनाथ करके स्वयं, पाँच वार संसार में,&lt;br /&gt;हे विधे, बहाता हैबता, अब तू क्यों मँझधार में ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हठ कर मेरी ननद चाहती है वह होना,&lt;br /&gt;आवे इस पर हँसी मुझे आवे रोना ?&lt;br /&gt;पहले मेरी ननद दुःशाला ही तो हो ले ?&lt;br /&gt;बन जाते हैं कुटिल वचन भी कैसे भोले !&lt;br /&gt;मैं कौन और वह कौन है, मैं यह भी हूँ जानती।”&lt;br /&gt;कर आप अधर दंशन चली कृष्णा भौंहे तानती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“आ, विपत्ति, आ, तुझे नहीं डरती हूँ अब मैं,&lt;br /&gt;देखूँ बढ़कर आप कि क्या करती हूँ अब मैं।&lt;br /&gt;भय क्या है, भगवान भाव ही में है मेरा,&lt;br /&gt;निश्चय, निश्चय जिये हृदय, दृढ़ निश्चय तेरा।&lt;br /&gt;मैं अबला हूँ तो क्या हुआ ? अबलों का बल राम है,&lt;br /&gt;कर्मानुसार भी अन्त में शुभ सबका परिणाम है।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सैरन्ध्री को देख सहज अपने घर आया,&lt;br /&gt;कीचक ने आकाश-शशी भू पर-सा पाया।&lt;br /&gt;स्वागत कर वह उसे बिठाने लगा प्रणय से,&lt;br /&gt;किन्तु खड़ी ही रही काँप कर कृष्णा भय से।&lt;br /&gt;चुपचाप चित्र देकर उसे ज्यों ही वह चलने लगी,&lt;br /&gt;त्यों ही कीचक की कामना उसको यों छलने लगी –&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“सुमुखि, सुन्दरी मात्र तुझे मैं समझ रहा था,&lt;br /&gt;पर तू इतनी कुशल ! बहन ने ठीक कहा था।&lt;br /&gt;इस रचना पर भला तुझे क्या पुरस्कार दूँ ?&lt;br /&gt;तुझ पर निज सर्वस्व बोल मैं अभी वार दूँ !”&lt;br /&gt;बोली कृष्णा मुख नत किए – “क्षमा कीजिए बस मुझे,&lt;br /&gt;कुछ, पुरस्कार के काम में, नहीं दिखता रस मुझे।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“रचना के ही लिए हुआ करती है रचना।”&lt;br /&gt;कृष्णा चुप हो गई कठिन था तब भी बचना।&lt;br /&gt;बोला खल – “पर दिखा चुका जो ललित कला यह,&lt;br /&gt;क्या चूमा भी जाय कुशलता-कर न भला वह ?&lt;br /&gt;सैरन्ध्री कहूं विशेष क्या तू, ही मेरी सम्पदा,&lt;br /&gt;मेरे वश में है, राज्य यह, मैं तेरे वश में सदा।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हे णनुपम आनन्द-मूर्ति, कृशतनु, सुकुमारी,&lt;br /&gt;बलिहारी यह रुचिर रूपर की राशि तुम्हारी !&lt;br /&gt;क्या तुम हो इस योग्य, रहो जो बनकर चेरी,&lt;br /&gt;सुध बुध जाती रही देख कर तुझको मेरी।&lt;br /&gt;इन दृग्बाणों से बिद्ध यह मन मेरा जब से हुआ,&lt;br /&gt;है खान-पान-शयनादि सब विष-समान तब से हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब हे रमणीरत्न, दया कर इधर निहारो,&lt;br /&gt;मेरी ऐसी प्रीति नहीं कि प्रतीति न धारो।&lt;br /&gt;मैं तो हूँ अनुरक्त, तनिक तुम भी अनुरागो।&lt;br /&gt;रानी होकर रहो, वेश दासी का त्यागो।&lt;br /&gt;होती है यद्यपि खान में किन्तु नहीं रहती पड़ी,&lt;br /&gt;मणि, राज-मुकुट में ही प्रिये, जाती है आखिर जड़ी।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“अहो वीर बलवान, विषम विष की धारा-से,&lt;br /&gt;बोलो ऐसी बात न तुम मुझ पर-दारा से।&lt;br /&gt;तुम जैसे ही बली कहीं अनरीति से करेंगे,&lt;br /&gt;तो क्या दुर्बल जीव धर्म का ध्यान धरेंगे ?&lt;br /&gt;नर होकर इन्द्रिय-वश अहो ! करते कितने पाप हैं,&lt;br /&gt;निज अहित-हेतु अविवेकि जन होते अपने आप हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजोचित सुख-भोग तुम्हीं को हों सुख-दाता,&lt;br /&gt;कर्मों के अनुसार जीव जग में फल पाता।&lt;br /&gt;रानी ही यदि किया चाहता मुझको धाता,&lt;br /&gt;तो दासी किसलिए प्रथम ही मुझे बनाता।&lt;br /&gt;निज धर्म-सहित रहना भला, सेवक बन कर भी सदा,&lt;br /&gt;यदि मिले पाप से राज्य भी, त्याज्य समझिए सर्वदा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस कारण हे वीर, न तुम यों मुझे निहारो,&lt;br /&gt;फणि-मणि पर निज कर न पसारो, मन को मारो।&lt;br /&gt;प्रेम करूँ मैं बन्धु, मुझे तुम बहन विचारो, -&lt;br /&gt;पाप-गर्त्त से बचो, पुण्य-पथ पर पद धारो।&lt;br /&gt;अपने इस अनुचित कर्म के लिए करो अनुताप तुम,&lt;br /&gt;मत लो मस्तक पर वज्र-सम सती-धर्म का शाप तुम।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कृष्णा ने इस भाँति उसे यद्यपि समझाया,&lt;br /&gt;किन्तु एक भी वचन न उसके मन को भाया।&lt;br /&gt;मद-मत्तों को यथा-योग्य उपदेश सुनाना,&lt;br /&gt;है ऊपर में यथा वृथा पानी बरसाना।&lt;br /&gt;कर सकते हैं जो जन नहीं मनोदमन अपना कभी,&lt;br /&gt;उनके समक्ष शिक्षा कथन निष्फल होता है सभी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“रहने दो यह ज्ञान, ध्यान, ग्रन्थों की बातें !&lt;br /&gt;फिर भिर आती नहीं सुयौवन की दिन-रातें।&lt;br /&gt;करिए सुख से वही काम, जो हो मनमाना,&lt;br /&gt;क्या होगा मरणोपरान्त, किसने यह जाना ?&lt;br /&gt;जो भावों की आशा किए वर्तमान सुख छोड़ते,&lt;br /&gt;वे मानो अपने आप ही निज-हित से मुँह मोड़ते।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कह कर ऐसे वचन वेग से बिना विचारे,&lt;br /&gt;आतुर हो अत्यन्त, देह की दशा बिसारे।&lt;br /&gt;सहसा उसने पकड़ लिया कर पांचाली का,&lt;br /&gt;मानो किसल-गुच्छ नाग ने नत डाली का।&lt;br /&gt;कीचक की ऐसी नीचता देख सती क्षोभित हुई,&lt;br /&gt;कर चक्षु चपल-गति से चकित शम्पा-सी शोभित हुई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो सकम्प तनु-यष्टि ढूलती रज्जु सदृश थी,&lt;br /&gt;शिथिल हुई निर्जीव दीख पड़ती अति कृश थी।&lt;br /&gt;आहा ! अब हो उठी अचानक वह हुंकारित,&lt;br /&gt;ताब-पेंच खा बनी कालफणिनी फुंकारित।&lt;br /&gt;भ्रम न था रज्जु में सर्प की उपमा पूरी घट गई,&lt;br /&gt;कीचक के नीचे की धरा मानों सहसा हट गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“अरे नराधम, तुझे नहीं लज्जा आती है ?&lt;br /&gt;निश्चय तेरी मृत्यु मुण्ड पर मंडराती है।&lt;br /&gt;मैं अबला हूँ किन्तु न अत्याचार सहूँगी,&lt;br /&gt;तुझे दानव के लिए चण्डिका भी बनी रहूँगी।&lt;br /&gt;मत समझ मुझे तू शशि-सुधा खल, निज कल्मष राहू की,&lt;br /&gt;मैं सिद्ध करूँगी पाशता अपने वामा-बाहु की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;होता हैयदि पुलक हमारी गल-बाहों में, -&lt;br /&gt;तो कालानल नित्य निकलता है आहों में !”&lt;br /&gt;यों कह कर झट हाथ छुड़ाने को उस खल से,&lt;br /&gt;तत्क्षण उसने दिया एक झटका अति बल से।&lt;br /&gt;तब मानों सहसा मुँह के बल वहाँ मदोन्मत्त वह गिर पड़ा,&lt;br /&gt;मानों झंझा के वेग से पतित हुआ पादप बड़ा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तब विराट की न्याय-सभा की नींव हिलाने,&lt;br /&gt;उस कामी को कुटिल-कर्म का दण्ड दिलाने,&lt;br /&gt;कच-कुच और नितम्ब-भार से खेदित होती,&lt;br /&gt;गई किसी विध शीघ्र द्रौपदी रोती रोती।&lt;br /&gt;पीछे से उसको मारने उठकर कीचक भी चला,&lt;br /&gt;उस अबला द्वारा भूमि पर गिरना उसको खला।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कृष्णा पर कर कोप शीघ्र झपटा वह ऐसे –&lt;br /&gt;थकी मृगी की ओर तेंदुआ लपके जैसे।&lt;br /&gt;भरी सभा में लात उसे उस खल ने मारी,&lt;br /&gt;छिन्न लता-सी गिरी भूमि पर वह पेजारी।&lt;br /&gt;पर सँभला कीचक भी नहीं निज बल-वेग विशेष से,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc0000;"&gt;क्रमश.....&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#009900;"&gt;==========oooooo==========&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;color:#993399;"&gt;प्रस्तुतिः जयप्रकाश मानस, &lt;/span&gt;&lt;a href="http://srijansamman.blogspot/"&gt;&lt;span style="font-size:85%;color:#993399;"&gt;सृजनसम्मान&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#009900;"&gt;==========oooooo===========&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#009900;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/33911561-115748542788976346?l=sairendhri.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sairendhri.blogspot.com/feeds/115748542788976346/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=33911561&amp;postID=115748542788976346' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/33911561/posts/default/115748542788976346'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/33911561/posts/default/115748542788976346'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sairendhri.blogspot.com/2006/09/blog-post_05.html' title=''/><author><name>जयप्रकाश मानस</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='14342237620319221204'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-33911561.post-115748524905442854</id><published>2006-09-05T12:37:00.000-07:00</published><updated>2006-09-05T12:40:49.060-07:00</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;span style="font-size:130%;color:#ff6600;"&gt;&lt;strong&gt;सैरेन्ध्री&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt;वेश मलिन था किन्तु रूप आवेश भरा था।&lt;br /&gt;था उद्देश्य अवश्य किन्तु आदेश भरा था।&lt;br /&gt;मुख शान्त दिनान्त समान ही, निष्प्रभ किन्तु पवित्र था।&lt;br /&gt;नभ के अस्फुट नक्षत्र-सा, हार्दिक भाव विचित्र था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझ पर आदर दिखारही थी, पर निर्भय थी,&lt;br /&gt;अनुनय उसमें न था, सहज ही वह सविनय थी।&lt;br /&gt;नेत्र बड़े थे, किन्तु दृष्टि भी सूक्ष्म बड़ी ही,&lt;br /&gt;सबके मन में पैठ बैठ वह गई खड़ी ही !&lt;br /&gt;वह हास्य बीच में ही रुका, सन्नाटा-सा छा गया,&lt;br /&gt;मेरे गौरव में भी स्वयं कुछ घाटा-सा आ गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुद्रा वह गम्भीर देख सब रुकी, जकी-सी&lt;br /&gt;और दृष्टियाँ एकसाथ सबझुकी, थकी-सी।&lt;br /&gt;काले काले बाल कन्धरा ढके खुले थे&lt;br /&gt;गुँथे हुए-से व्याल मुक्ति के लिए तुले थे !&lt;br /&gt;दृक्पात न करती थी तनिक सौध विभव की ओर वह,&lt;br /&gt;क्या कहूँ सौम्य या घोर थी कोमल थी कि कठोर वह !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सहसा मैं उठ खड़ी हुई उठ खड़ी हुई सब,&lt;br /&gt;पर नीरव थी, भ्रान्त भाव में पडडी हुई सब।&lt;br /&gt;कया ससम्भ्रम प्रश्न अन्त में मैंने ऐसे –&lt;br /&gt;भद्रे, तुम हो कौन ! और आई हो कैसे ?&lt;br /&gt;उसके उत्तर के भाव का लक्ष्य न जाने था कहाँ –&lt;br /&gt;मैं ? हाँ मैं अबला हूँ तथा आश्रयार्थ आई यहाँ।&lt;br /&gt;इस पर निकला यहीवचन तब मेरे मुख से –&lt;br /&gt;अपना ही घर समझ यहाँ ठहरो तुम सुख से।&lt;br /&gt;आश्रयार्थिनी नहीं असल में अतिथि बनी वह,&lt;br /&gt;नहीं सेविका, किन्तु हुई मेरी स्वजनी वह।&lt;br /&gt;अनुचरियों को साहस नहीं समझें उसे समान वे,&lt;br /&gt;रह सकती नहीं किए बिना उसका आदर मान वे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुधा अन्यमनस्क दिखाई पड़ती है वह,&lt;br /&gt;मानो नीरव आप आप से लड़ती है वह !&lt;br /&gt;करती करती काम अचानक रुक जाती है,&lt;br /&gt;करके ग्रीवा-भंग झोंक से झुक जाती है !&lt;br /&gt;बस भर सँभाल कर चित्त को श्रम से वह थकती नहीं,&lt;br /&gt;पर भूल करे तो भर्त्सना मैं भी कर सकती नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कार्य-कुशलता देख-देख उसकी विस्मय से,&lt;br /&gt;इच्छा होती है कि बड़ाई करे हृदय से।&lt;br /&gt;किन्तु दीर्घ निश्वास उसे लेते विलोक कर,&lt;br /&gt;रखना पड़ता मौन-भाव ही सहज शोक कर !&lt;br /&gt;कुछ भेद पूछने से उसे होता मन में खेद है,&lt;br /&gt;अति असन्तोष है पर उसे यांचा से निर्वेद है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसी ही दृढ़ जटिल चरित्रा है वह नारी,&lt;br /&gt;दुखिया है, पर कौन कहे उसको बेचारी।&lt;br /&gt;जब तब उसको देख भीति होती है मन में,&lt;br /&gt;तो भी उस पर परम प्रीति होती है मन में।&lt;br /&gt;अपना आदर मानो दया – करके वह स्वीकारती,&lt;br /&gt;पर दया करो तो वह स्वयं, घृणा-भाव है धारती !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वृक्ष-भिन्न-सी लता तदपि उच्छिन्न नहीं वह,&lt;br /&gt;मेरा सद्व्यवहार देखकर खिन्न नहीं वह।&lt;br /&gt;जान सकी मैं यही बात उस गुणवाली की,&lt;br /&gt;आली है वह विश्व-विदित उस पांचाली की।&lt;br /&gt;जो पंच पाण्डवों की प्रिया प्रिय-समेत प्रच्छन्न है,&lt;br /&gt;बस इसीलिए वह सुन्दरी सम्प्रति व्यग्र विपन्न है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किन्तु तुम्हें यह उचित नहीं जो उसको छेड़ो,&lt;br /&gt;बुनकर अपन शौर्य्य यशःट यों न उघेड़ो।&lt;br /&gt;गुप्त पाप ही नहीं, प्रकट भय भी है इसमें,&lt;br /&gt;आत्म-पराजय मात्र नहीं, क्षय भी है इसमें।&lt;br /&gt;सब पाण्डव भी होंगे प्रकट, नहीं छिपेगा पाप भी&lt;br /&gt;सहना होगा इस राज्य को अबला का अभिशाप भी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुन्दरियों का क्या अभाव है, तुम्हें, बताओ,&lt;br /&gt;जो तुम होकर शूर उसे इस भाँति सताओ।&lt;br /&gt;जीत सके मन भी न वीर तुम कैसे फिर हो ?&lt;br /&gt;कहलाते हो धीर और इतने अस्थिर हो !&lt;br /&gt;हम अबालाए तो एक की, होकर रहती हैं सदा&lt;br /&gt;तुम पुरुषों को सौ भी नहीं, होती हैं तृप्ति-प्रदा !”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“बहन किसे यह सीख सिखाती हो तुम, मुझको ?&lt;br /&gt;किसे धर्म का मार्ग दिखाती हो तुम, मुझको !&lt;br /&gt;व्यर्थ ! सर्वथा व्यर्थ ! सुनूँ देखूँ क्या अबमैं !&lt;br /&gt;सारी सुध-बुध ऊधर गँवा बैठा हूँ जब मैं।&lt;br /&gt;उस मृगनयनी की प्राप्ति ही, है सुकीर्त्ति मेरी, सुनो,&lt;br /&gt;चाहो मेरा कल्याण तो, कोई जाल तुम्हीं बुनो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुन्दरियों का क्या अभव है मुझे, नहीं है,&lt;br /&gt;प्राप्त वस्तु से किन्तु हुआ सन्तोष कहीं है ?&lt;br /&gt;आग्रह तो अप्राप्त वस्तु का ही होता है,&lt;br /&gt;हृदय उसी के लिए हाय ! हठ कर रोता है।&lt;br /&gt;उसके पाने में ही प्रकट, होती है वर वीरता,&lt;br /&gt;सोचो, समझो, इस तत्व की तनिक तुम्हीं गंभीरता।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह कामी निर्लज्ज नीच कीचक यह कह कर,&lt;br /&gt;चला गया, मानों अधैर्य धारा में बह कर।&lt;br /&gt;उसकी भगिनी खड़ी रही पाषाण-मूर्ति-सी,&lt;br /&gt;भ्राता के भय और लाज की स्वयं पूर्त्ति-सी !&lt;br /&gt;देखा की डगमग जाल वह उसकी अपलक दृष्टि से, -&lt;br /&gt;जो भीग रही थी आप निज, घोर घृणा की वृष्टि से।&lt;br /&gt;“राम-राम ! यह वही बली मेरा भ्राता है,&lt;br /&gt;कहलाता जो एक राज्य भर का त्राता है !&lt;br /&gt;जो अबला से आज अचानक हार रहा है,&lt;br /&gt;अपना गौरव, धर्म, कर्म, सब वार रहा है।&lt;br /&gt;क्या पुरुषों के चारित्र्य का, यही हाल है लोक में ?&lt;br /&gt;होता है पौरुष पुष्ट क्या, पशुता के ही ओक में ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुन्दरता यदि बिधे, वासना उपजाती है,&lt;br /&gt;तो कुल-ललना हाय ! उसे फिर क्यों पाती है ?&lt;br /&gt;काम-रीति को प्रीति नाम नर देते हं बस,&lt;br /&gt;कीट तृप्ति के लिए लूटते हैं प्रसून-रस।&lt;br /&gt;यदि पुरुष जनों का प्रेम है पावन नेम निबाहता&lt;br /&gt;तो कीचक मुझ-सा क्यों नहीं सैरन्ध्री को चाहता ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सैरन्ध्री यह बात श्रवण कर क्या न कहेगी ?&lt;br /&gt;वह मनस्विनी कभी मौन अपमान सहेगी ?&lt;br /&gt;घोर घृणा की दृष्टि मात्र वह जो डालेगी,&lt;br /&gt;मुझको विष में बुझी भाल-सी वह सालेगी !&lt;br /&gt;ऐसे भाई की बहन मैं, हूँगी कैसे सामने,&lt;br /&gt;होते हैं शासन-नीति के दोषी जैसे सामने।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किन्तु इधर भी नहीं दीखती है गति मुझको,&lt;br /&gt;उभय ओर कर्त्तव्य कठिन है सम्प्रति मुझको।&lt;br /&gt;विफलकाम यदि हुआ हठी कीचक कामातुर,&lt;br /&gt;तो क्या जाने कौन मार्ग ले वह मदान्ध-उर।&lt;br /&gt;राजा भी डरते हैं उसे, वह मन में किससे डरे ?&lt;br /&gt;क्या कह सकता है कौन, वह – जो कुछ भी चाहे करे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे यह उत्पात शान्त हो तभी कुशल है,&lt;br /&gt;विद्रोही विख्यात बली कीचक का बल है।&lt;br /&gt;नहीं मानता कभी क्रूर वह कोई बाधा,&lt;br /&gt;राज-सैन्य को युक्ति-युक्त है उसने साधा।&lt;br /&gt;सैरन्ध्री सम्मत हो कहीं, तो फिर भी सुविधा रहे।&lt;br /&gt;पर मैं रानी दूती बनूँ, हृदय इसे कैसे सहे ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मन ही मन यहसोच सोच कर सभय सयानी,&lt;br /&gt;सैरन्ध्री से प्रेम सहित बोली तब रानी –&lt;br /&gt;इतने दिन हो गए यहाँ तुझको सखि, रहते,&lt;br /&gt;देखी गई न किन्तु स्वयं तू कुछ कहते।&lt;br /&gt;क्या तेरी इच्छा-पूर्ति की पा न सकूँगी प्रीति मैं ?&lt;br /&gt;विस्मित होती हूँ देख कर, तेरी निस्पृह नीति मैं !”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सैरन्ध्री उस समय चित्र-रचना करती थी,&lt;br /&gt;हाथ तुला था और तूलिका रंग भरती थी।&lt;br /&gt;देख पार्श्व से मोड़ महा ग्रीवा, कुछ तन कर,&lt;br /&gt;हँस बोली वह स्वयं एक सुन्दर छवि बनकर&lt;br /&gt;“मैं क्या मांगूँ जब आपने, यों ही सब कुछ है दिया।&lt;br /&gt;आज्ञानुसार वह दृश्य यह, लीजे, मैंने लिख दिया।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“क्रिया-सहित तू वचन-विदग्धा भी है आली,&lt;br /&gt;है तेरी प्रत्येक बात ही नई, निराली।”&lt;br /&gt;यह कह रानी देख द्रौपदी को मुसकाई,&lt;br /&gt;करने लगी सुचित्र देख कर पुनः बड़ाई।&lt;br /&gt;“अंकित की है घटना विकट, किस पटुता के साथ में,&lt;br /&gt;सच बतला जादू कौन-सा है तेरे इस हाथ में ?”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ पुलकित कुछ चकित और कुछ दर्शक शंकित,&lt;br /&gt;नृप विराट युत एक ओर थे छबि में अंकित।&lt;br /&gt;एक ओर थी स्वयं सुदेष्णा चित्रित अद्भुत –&lt;br /&gt;बैठी हुई विशाल झरोखे में परिकर युत,&lt;br /&gt;मैदान बीच में था जहाँ, दो गज मत्त असीम थे,&lt;br /&gt;उन दृढ़दन्तों के बीच में, बल्लव रूपी भीम थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही भीम-गज-युद्ध चित्र का मुख्य विषय था,&lt;br /&gt;जब निश्चय के साथ साथ ही सबको भय था।&lt;br /&gt;पार्श्वों से भुजदण्ड वीर के चिपट रह थे,&lt;br /&gt;उनमें युग कर-शुण्ड नाक-से लिपट रहे थे।&lt;br /&gt;गज अपनी अपनी ओर थे उन्हें खींचते कक्ष से,&lt;br /&gt;पर खिंचे जा रहे थे स्वयं, भीम-संग प्रत्यक्ष।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निकल रहा था वक्ष वीर का आगे तन कर,&lt;br /&gt;पर्वत भी पिस जाए, अड़े जो बाधक बन कर,&lt;br /&gt;दक्षिण-पद बढ़ चुका वाम अब बढ़ने को था,&lt;br /&gt;गौरव-गिरि के उच्च श्रृंग पर चढ़ने को था।&lt;br /&gt;मद था नेत्रों में दर्प का, मुख पर थी अरुणच्छटा,&lt;br /&gt;निकलाहो रवि ज्यों फोड़ कर, युगल गजों की घन घटा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रानी बोली – “धन्य तूलिका है सखि तेही,&lt;br /&gt;कला-कुशलता हुई आप ही आकर चेरी।&lt;br /&gt;किन्तु आपको लिखा नहीं तूने क्यों इसमें ?&lt;br /&gt;वल्लव को प्रत्य़क्ष जयश्री रहती जिसमें ?&lt;br /&gt;उस पर तेरा जो भाव है, मैं उसको हूँ जानती,&lt;br /&gt;हँसती हैलज्जा युक्त तू, तो भी भौंहें तानती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोष जताने से न प्यार का रंग छिपेगा,&lt;br /&gt;सौ ढोंगों से भी न कभी वह ढंग से छिपेगा।&lt;br /&gt;विजयी वल्लव लड़ा वन्य जीवों से जब जब –&lt;br /&gt;सहमी सबसे अधिक अन्त तक तू ही तब तब।&lt;br /&gt;फल देख युद्ध का अन्त में बची साँस-सी ले अहा !&lt;br /&gt;तेरे मुख का वह भाव है मेरे मन में बस रहा।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“कह तो लिक दूँ उसे अभी इस चित्र फलक पर !&lt;br /&gt;बात नहीं जो मुकर सके तू किसी झलक पर।&lt;br /&gt;कह तो आँखें लिखूँ नहीं जो यह सह सकती,&lt;br /&gt;न तो देख सकती न बिना देखे रह सकती।&lt;br /&gt;या लिखूँ कनौखी दृष्टि वह, विजयी वल्लव पर पड़ी ?&lt;br /&gt;नीचे मुख की मुसकान में, मुग्ध हृदय की हड़बड़ी !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वल्लव फिर भी सूपकार, साधारण जन है, -&lt;br /&gt;और उच्च पद-योग्य धन्य यह यौवन-धन है।”&lt;br /&gt;कृष्णा बोली – “देवि, आप कुछ कहें भले ही,&lt;br /&gt;मुझको संशय योग्य समझती रहें भले ही।&lt;br /&gt;पर करती नहीं कदापि हूँ कोई अनुचित कर्म मैं,&lt;br /&gt;दासी होकर भी आपकी, रखती हूँ निज धर्म मैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लड़ता है नर एक क्रूर पशुओं से डट कर,&lt;br /&gt;कौतुक हम सब लोग देखते हैं हट-हट कर।&lt;br /&gt;उस पर तदपि सहानुभूति भी उदित न हो क्या ?&lt;br /&gt;और उसे फिर जयी देख मन मुदित न हो क्या ?&lt;br /&gt;यदि इतने से ही मैं हुई, संशय योग्य कोघोष से,&lt;br /&gt;तो क्षमा कीजिए आप भी – बचेंगी न इस दोष से।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पद से ही मैं किन्तु मानती नहीं महत्ता,&lt;br /&gt;चाहे जितनी क्यों न रहे फिर उसमें सत्ता।&lt;br /&gt;स्थिति से नहीं, महत्व गुणों से ही बढ़ता है,&lt;br /&gt;यों मयूर से गीध अधिक ऊँचे चढ़ता है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;क्रमशः......&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#ff6600;"&gt;==========ooooo==========&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;प्रस्तुतिः जयप्रकाश मानस, &lt;/span&gt;&lt;a href="http://srijansamman.blogspot/"&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;सृजनसम्मान&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#ff6600;"&gt;=========oooooo==========&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/33911561-115748524905442854?l=sairendhri.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sairendhri.blogspot.com/feeds/115748524905442854/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=33911561&amp;postID=115748524905442854' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/33911561/posts/default/115748524905442854'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/33911561/posts/default/115748524905442854'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sairendhri.blogspot.com/2006/09/blog-post.html' title=''/><author><name>जयप्रकाश मानस</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='14342237620319221204'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-33911561.post-115748501188994304</id><published>2006-09-05T12:32:00.000-07:00</published><updated>2006-09-05T12:36:51.903-07:00</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;strong&gt;सैरन्ध्री &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt;सुफल-दायिनी रहें राम – कर्षक की सीता;&lt;br /&gt;आर्य-जनों की सुरुचि-सभ्यता-सिद्धि पुनिता।&lt;br /&gt;फली धर्म-कृषि, जुती भर्म-भू शंका जिनसे,&lt;br /&gt;वही एग हैं मिटे स्वजीवन – लंका जिनसे।&lt;br /&gt;वे आप अहिंसा रुपिणी परम पुण्य की पूर्ति-सी,&lt;br /&gt;अंकित हों अन्तः – क्षेत्र में मर्यादा की मूर्ति-सी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बुरे काम का कभी भला परिणाम न होगा,&lt;br /&gt;पापी जन के लिए कहीं विश्राम न होगा।&lt;br /&gt;अविचारी का काल भाल पर ही फिरता है,&lt;br /&gt;कहीं सँभलता नहीं शील से जो गिरता है।&lt;br /&gt;होते हैं कारण आप ही अविवेकी निज नाश में,&lt;br /&gt;फँसते हैं कीचक सम स्वयं मनुजाधम यम-पाश में।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब विराट के यहाँ वीर पाण्डव रहते थे,&lt;br /&gt;छिपे उहे अज्ञात – वास – बाधा सहते थे।&lt;br /&gt;एक बार तब देख द्रौपदी की शोभा अति –&lt;br /&gt;उस पर मोहित हुआ नीच कीचक सेनापति।&lt;br /&gt;यों प्रकट हुई उसकी दशा दृग्गोचर कर रूपवर,&lt;br /&gt;होता अधीर ग्रीष्मार्त गज ज्यों पुष्करिणी देखकर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यद्यपि दासी बनी, वस्त्र पहने साधारण,&lt;br /&gt;मलिनवेश द्रौपदी किए रहती थी धारण।&lt;br /&gt;वसन-वह्नि-सी तदपि छिपी रह सकी न शोभा,&lt;br /&gt;उस दर्शक का चित्र और भी उस पर लोभा।&lt;br /&gt;अति लिपटी भी शैवाल में कमल-कली है सोहती,&lt;br /&gt;घन-सघन-घटा में भी घिरी चन्द्रकला मन मोहती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छिपी हुई भी प्रकट रही मानों पांचाली,&lt;br /&gt;छिप सकती थी कहाँ कान्ति कला निराली ?&lt;br /&gt;वह अंगों की गठन और अनुपम अलकाली,&lt;br /&gt;जा सकती थी कहाँ चाल उसकी मतवाली ?&lt;br /&gt;काली काली आँखें बड़ी कानों से थीं लग रहीं,&lt;br /&gt;गुण और रूप की ज्योतियाँ स्वाभाविक थीं जग रहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सतियाँ पति के लिए सभी कुछ कर सकती हैं,&lt;br /&gt;और अधिक क्या, मोद मान कर मर सकती हैं।&lt;br /&gt;नृप विराट की विदित सुदेष्णा थी जो रानी,&lt;br /&gt;दासी उसकी बनी द्रौपदी परम सयानी।&lt;br /&gt;थी किन्तु देखने में स्वयं रानी की रानी वही,&lt;br /&gt;कीचक की, जिसको देख कर सुध-बुध सब जाती रही।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कीचक मूढ़, मदान्ध और अति अन्यायी था,&lt;br /&gt;नृप का साला तथा सुदेष्णा का भाई था।&lt;br /&gt;भट-मी वह मत्स्यराज का था सेनानी,&lt;br /&gt;गर्व-सहित था सदा किया करता मनमानी।&lt;br /&gt;रहते थे स्वयं विराट भी उससे सदा सशंक-से,&lt;br /&gt;कह सकते थे न विरुद्ध कुछ अधिकारी आतंक से।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तृप्त होकर रम्य रूप-रस की तृष्णा से,&lt;br /&gt;बोला वह दुर्वृत्त एक दिन यों कृष्णा से –&lt;br /&gt;“सैरन्ध्री, किस भाग्यशील की भार्या है तू ?&lt;br /&gt;है तो दासी किन्तु गुणों से आर्या है तू !&lt;br /&gt;मारा है स्मर ने शर मुझे तेरे इस भ्रू-चाप से !&lt;br /&gt;अब तकतड़पूँगा भला विरह-जन्य सन्ताप से ?”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसके ऐसे वचन श्रवण कर राजसदन में,&lt;br /&gt;कृष्णा जलने रोष से अपने मन में।&lt;br /&gt;किन्तु समय को देख किसी विध धीरज धर के,&lt;br /&gt;उससे कहने लगी शान्ति से शिक्षा करके।&lt;br /&gt;होता आवेश विशेष है यद्यपि मनोविकार में,&lt;br /&gt;समयानुसार ही कार्य करते हैं संसार में।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“सावधान हे वीर, न ऐसे वचन कहो तुम,&lt;br /&gt;मन को रोको और संयमी बने रहो तुम।&lt;br /&gt;है मेरा भी धर्म, उसे क्या खो सकती हूँ ?&lt;br /&gt;अबला हूँ, मैं किन्तु न कुलटा हो सकती हूँ।&lt;br /&gt;मां दीना हीना हूँ सही, किन्तु लोभ-लीना नहीं,&lt;br /&gt;करके कुकर्म संसार में मुझको है जीन नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर-नारी पर दृष्टि डालना योग्य नहीं है,&lt;br /&gt;और किसी का भाग्य किसी को भोग्य नहीं है।&lt;br /&gt;तुमको ऐसा उचित नहीं, यह निश्चय जानो,&lt;br /&gt;निन्द्य कर्म से डरो, धर्म का भी भय मानो।&lt;br /&gt;हैं देख रहे ऊपर अमर नीचे नर क्या कर रहे,&lt;br /&gt;दुष्कृत में सुख है तो सुजन सुकृतों पर क्यों मर रहे ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे पति हैं पाँच देव अज्ञात निवासी,&lt;br /&gt;तन-मन-धन से सदा उन्हीं की हूँ मैं दासी।&lt;br /&gt;बड़े भाग्य से मिले मुझे ऐसे स्वामी हैं,&lt;br /&gt;धर्म-रूप वे सदा धर्म के अनुगामी हैं।&lt;br /&gt;इसलिए न छेड़ो तुम मुझे, सह न सकेंगे वे इसे,&lt;br /&gt;श्रुत भीम पराक्रम-शील वे मार नहीं सकते किसे ?”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कीचक हँसने लगा और फिर उससे बोला –&lt;br /&gt;“सैरन्ध्री, तेरा स्वभाव है सचमुच भोला।&lt;br /&gt;तुझसेबढ़कर और पुण्य का फल क्या होगा,&lt;br /&gt;जा सकता है यहीं स्वर्ग-सुख तुझसे भोगा।&lt;br /&gt;भय रहने दे जय बोल तू, मेरा कीचक नाम है।&lt;br /&gt;तेरे प्रभ-पंचक से मुझे चिन्त्य पंचशर काम है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं तेरा हो चुका, तू न होगी क्या मेरी ?&lt;br /&gt;पथ-प्रतीक्षा किया करूँगा कब तक तेरी ?&lt;br /&gt;आज रात में दीप-शिखा-सी तू आ जाना,&lt;br /&gt;दृष्टि-दान कर प्राण-दान का पुण्य कमाना।&lt;br /&gt;जो मूर्ति हृदय में है बसी वही सामने हो खड़ी,&lt;br /&gt;आ जावे झट-पट वह घड़ी यही लालसा है बड़ी।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह कहकर वह चला गया उस समय दम्भ से,&lt;br /&gt;कृष्णा के पद हुए विपद-भय-जड़-स्तम्भ से !&lt;br /&gt;जान पड़ा वह राजभवन गिरी-गुहा सरीखा,&lt;br /&gt;उसमें भीषण हिंस्र-जन्तु-सा उसको दीखा।&lt;br /&gt;वह चकित मृगी-सी रह गई आँखें, फाड़ बड़ी-बड़ी,&lt;br /&gt;पर-कट पक्ष्णी व्योम को देखे ज्यों भू पर पड़ी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बड़ी देर तक खड़ी रही वह हिली न डोली,&lt;br /&gt;फिर अचेत-सी अकस्मात चिल्लाकर बोली –&lt;br /&gt;“है क्या कोई मुझे बचाओ, करो न देरी,&lt;br /&gt;मैं अबला हूँ आज लाज लुट जाय न मेरी !&lt;br /&gt;ऊपर नीचे कोई सुने मेरी यही पुकार है –&lt;br /&gt;जिसको सद्धर्म-विचार है उस पर मेरा भार है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हरे ! हरे ! गोविन्द, कृष्ण, तुम आज कहाँ हो ?&lt;br /&gt;अथवा ऐसा ठौर कौन तुम नहीं जहाँ हो ?&lt;br /&gt;रक्खी मेरी लाज तुम्हीं ने बीच सभा में,&lt;br /&gt;हे अनन्त, पट तुम्हीं बने थे नीच-सभा में।&lt;br /&gt;फिर आज विकट संकट पड़ा निकट पुकारूँ मैं किसे ?&lt;br /&gt;यहअश्रु-वारि ही अर्घ्य है आओ अच्युत, लो इसे !”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भींगी कृष्णा इधर आँसुओं के पानी से,&lt;br /&gt;कीचक ने यों कहा उधर जाकर रानी से –&lt;br /&gt;“सैरन्ध्री-सी सखी कहाँ से तुमने पाई ?&lt;br /&gt;बहन, बताओ कि यह कौन है, कैसे आई ?&lt;br /&gt;देवी-सी दासी-रूप में दीख रही यह भामिनी।&lt;br /&gt;बन गई तुम्हारी सेविका मेरे मन की स्वामिनी !”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुन भाई की बात बहन ठिठकी, फिर बोली –&lt;br /&gt;“ठहरो भैया, ठीक नहीं इस भाँति ठिठोली।&lt;br /&gt; भाभी हैं क्या यहाँ चिढ़ें जो यह कहने से ?&lt;br /&gt;और मोद हो तुम्हें विनोद-विषय रहने से !&lt;br /&gt;अपमान किसी का जो करे वह विनोद भी है बुरा,&lt;br /&gt;यह सुनकर ही होगी न क्या सैरन्ध्री क्षोभातुरा !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं भी उसको पूर्णरूप से नहीं जानती,&lt;br /&gt;एक विलक्षण वधू मात्र हूँ उसे मानती।&lt;br /&gt;सुनो, कहूँ कुछ हाल कि वह है कैसी नारी ?&lt;br /&gt;उस दिन जब अवतीर्ण हुई, सन्ध्या सुकुमारी –&lt;br /&gt;बैठी थी मैं विश्रांन्ति से सहचरियों के संग में,&lt;br /&gt;होता था वचन-विलास कुछ हास्य पुर्ण रस-रंग में।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह सहसा आ खड़ी हुई मेरे प्रांगण में,&lt;br /&gt;जय-लक्ष्मी प्रत्यक्ष खड़ी हो जैसे रण में !&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#ff6600;"&gt;&lt;strong&gt;क्रमशः&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#ff6600;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#009900;"&gt;==========oooooo==========&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#ffcc33;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#cc9933;"&gt;प्रस्तुतिः जयप्रकाश मानस, &lt;/span&gt;&lt;a href="http://srijansamman.blogspot"&gt;&lt;span style="color:#cc9933;"&gt;सृजनसम्मान&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#ff6600;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;=========ooooooooo===========&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/33911561-115748501188994304?l=sairendhri.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sairendhri.blogspot.com/feeds/115748501188994304/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=33911561&amp;postID=115748501188994304' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/33911561/posts/default/115748501188994304'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/33911561/posts/default/115748501188994304'/><link 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